सरकार के आदेश की खुलेआम अवहेलना का मामला सामने आया है। आदेश सामने है मगर हक़ीक़त कुछ और

सरगुजा में शिक्षा विभाग में सरकार के आदेश की खुली अवहेलना।

बड़े अधिकारी से हुई बातचीत भी समाचार में।

सवाल ये कि सरकार के निर्देश बड़े या अधिकारी के चहेते?
अंबिकापुर में ज्वाईन डायरेक्टर और जिला शिक्षा अधिकारी पर उठे सवाल?

अधिकारी के चहेते प्रिंसिपल जिसमें एक का नाम भरत लाल अग्रवाल है ये हाई स्कूल पडौली विकास खंड लुंड्रा के प्रिंसिपल हैं।
ये  जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय अंबिकापुर में अटैच होकर दूसरे कई काम में पूरी तरह से संलग्न हैं।
वहीं दूसरा नाम संतोष साहू का है जिनकी पदस्थापना सूरजपुर जिले के सोनगरा में है लेक्चरर के तौर पर।जी हाँ सरगुजा नहीं सूरजपुर ज़िला यानि दूसरे जिले के कर्मचारी को यहाँ डंके की चोट पर रखकर काम कराया जा रहा है जिससे अंदर ही अंदर कई शिक्षक आक्रोश में हैं और उन्होंने इस पर प्रमाण सहित ख़बर के लिए हमसे संपर्क किया है।
सबसे बड़ी बात ये कि जब सरकार का स्पष्ट आदेश है कि किसी भी तरह का संलग्नीकरण नहीं होगा उसके बाद भी ये दोनों किस अधिकारी की विशेष कृपा से अंबिकापुर में जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय में पदस्थ किए गए हैं ।
सबसे हास्यास्पद बयान सरगुजा के JOIN DIRECTOR संजय गुप्ता का है जिनसे हमने बात की और ज़िला शिक्षा अधिकारी के कार्यालय में नियम विरुद्ध तरीक़े से संलग्न कर्मचारियों के बारे में पूछा इस पर उन्होंने कहा कि “इस विषय पर आप मुझसे सीधे बात कर रहे हैं जिस पर हमने स्पष्ट कहा कि विभाग में ज़िले के सबसे बड़े अधिकारी आप हैं और आपके अधीनस्थ ही वो कार्यालय है वहाँ सरकार के आदेश की अवहेलना खुलेआम हो रही है इस पर अधिकारी संजय गुप्ता ने कहा यदि बात सामने आती है तो कार्यवाही करेंगे।”
सवाल ये कि जब इनकी नाक के नीचे ही सरकार के आदेश को रद्दी के टोकरे में डाल दिया गया है और संभाग के सबसे बड़े मुख्यालय अंबिकापुर में रहने के बाद भी इनको यदि अपने मातहत काम करने वालों की जानकारी नहीं है तो पूरे ज़िले में शिक्षा विभाग में किस तरह से काम हो रहा है ये किसी को बताने की आवश्यकता नहीं है।
अभी तक आपने सुना होगा कि “ख़ुदा मेहरबान तो गधा पहलवान” मगर सरगुजा में यही कहावत कुछ इस तरह गूंज रही है कि “अधिकारी मेहरबान तो नियम कानून भी बेजान।”
वैसे भी सरगुजा ज़िले में शिक्षा विभाग में अधिकारियों के चहेतों की कारगुज़ारी बीच बीच में चर्चा में बनी रहती हैं लेकिन सरकार के आदेश को अपने सचिव के आदेश की नाफ़रमानी का ऐसा मामला देख कई साधारण परिवार के शिक्षक खुलेआम कह रहे हैं कि यहाँ पदस्थ कुछ अधिकारियों का पुराना इतिहास खंगाला जाए तो ऊपर बैठे अधिकारियों के होश भी उड़ जाएँगे लेकिन सत्ता के पक्ष विपक्ष में इनकी ऐसी सेटिंग रहती है कि इनकी बात और इनकी कारगुज़ारी ऊपर तक पहुंच ही नहीं पातीं।
अब देखना ये है कि चहेतों को रख यहाँ के ज़िला शिक्षा अधिकारी जिस तरह से काम करवा कर सरकार के आदेश से भी अपने को ऊपर रख रहे हैं उस पर मंत्रालय क्या रूख अपनाता है।

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