बच्चों से लेकर बुज़ुर्ग, मरीज़, विद्यार्थी सब परेशान हैं बस ज़िम्मेदार किनारे बैठ तमाशा देख रहे हैं।

अंबिकापुर में गणपति विसर्जन के दौरान देर रात तक बजता जानलेवा डीजे और आमदिनों में गली,मोहल्लों से लेकर मुख्य मार्ग तक तेज़ धमाकों वाले साइलेंसर की गाड़ियों से हुड़दंग मचाते मनचलों की मनमानी का बोझ न चाहते हुए भी बच्चों समेत बुजुर्गों, मरीज़ों और पढ़ने वाले विद्यार्थियों को ध्वस्त हो चुकी कानून व्यवस्था के कारण उठाना पड़ रहा है।
शहर के दो बड़े डॉक्टरों ने ‘ पहल ‘ से बात करते हुए स्पष्ट कहा है कि इससे हमारे क्लीनिक में डिलीवरी के बाद हुए नवजात शिशुओं समेत अन्य गम्भीर मरीजो पर बेहद प्रतिकूल असर पड़ रहा है। इसी विषय पर एक कानूनविद ने तो यहां तक कह दिया है कि “हम स्वतंत्र भारत में इस तरह रहने को विवश हैं जहां खुलेआम आमजन के मौलिक अधिकारों का ध्वस्त हो चुकी कानून व्यवस्था के कारण दिन दहाड़े उलंघन हो रहा है और राज्य के गृह मंत्री इस बात से बेख़बर होकर बस्तर में नक्सली उन्मूलन के नाम की माला जपने में ही व्यस्त हैं। इस शहर समेत ज़िले में ऐसी बदहाल कानून व्यवस्था के कारण लोग कराह रहे हैं लेकिन सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंग रही है।”
बात सही भी है कई लोगों ने जिसमें कई वरिष्ठ जन भी हैं वो बेबाकी से कहते हैं कि “इस तरह की अव्यवस्था को देख, कानून की हर गली, मोहल्लों में धज्जियां उड़ती देखने के लिए ही इस शहर में रहना अब हमारी मजबूरी बन चुकी है?”
बात सौ फीसदी सही है कानून का खौफ़ है नहीं, देर रात हो या दोपहर कभी भी कानफोडू बम फूटने जैसी आवाज़ वाले साइलेंसर और तीज त्यौहार में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद भी अनियंत्रित बेहद धमाकेदार आवाज़ वाले डीजे से अब हर मोहल्ले के बच्चे, बुज़ुर्ग और विद्यार्थियों में सिस्टम और सरकार के प्रति निराशा भरती जा रही है।
सरगुजा के सांसद और मंत्री समेत सत्ता में बैठे भाजपाई आखिर क्या मिसाल इस शहर और ज़िले को देना चाह रहे हैं वो समझ से परे है।
सरकार को ये याद रखना चाहिए कि जब आमजन में नाराज़गी इसी तरह बढ़ती है तो सत्ता की चूल हिलते देर नहीं लगती किंतु सत्ता के मद में चूर ज़िम्मेदार ही जब सब कुछ जानते हुए भी ग़ैर जिम्मेदाराना बर्ताव करने पर उतारू हों तो इनका भगवान ही मालिक है।
आश्चर्य ये कि यही भाजपा जब विपक्ष में थी तब चीख चीख कर भूपेश सरकार के कार्यकाल में ध्वस्त कानून व्यवस्था को मुद्दा बनाने से नहीं चूक रही थी लेकिन सत्ता में आते ही शायद भाजपा कानून व्यवस्था का अध्याय, नियम कानून कहीं भूल तो नहीं चुकी है?
आलोक शुक्ल,सम्पादक पहल।

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