गैंग्स ऑफ वासेपुर का गैंग्स ऑफ़ खरसिया नाका अंबिकापुर कनेक्शन। कई पहलू गंभीर जांच का विषय हैं।

गैंग्स ऑफ वासेपुर का खरसिया नाका अंबिकापुर में कनेक्शन।
दो महिलाओं की नृशंस हत्या का सजायाफ्ता आरोपी 2013 से अंबिकापुर में पड़े रहा और यहां किसी को भनक तक नहीं लगी।
झारखंड हाईकोर्ट ने सबीर आलम के आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा था तब से ये फरार था।
2012 में इरशाद आलम की एंट्री होती है।

इरशाद आलम आखिर करता क्या था जो इसके पास कीमती बसें हैं और इसी के नाम पर हैं।

यदि ये बस इसी फोटो वाले इरशाद आलम की हैं तो इसके नाम की संपत्ति के स्रोत की जाँच अहम कड़ी होगी।

हमारे समाचार को पढ़कर बलरामपुर ज़िले से इरशाद आलम नाम के युवक ने बताया कि ये दो बसें जो रामानुजगंज में हैं वहां के रहने वाले इरशाद की हैं वो नियम कानून से संचालित हो रही हैं।

इसी तरह अंबिकापुर में भी राजहंस बस जिस इरशाद आलम के नाम पर है उसे भी सामने आकर बताना चाहिए कि ये बसें किस तरह खरीदी गईं हैं।

एक नाम के दो इरशाद आलम भी एक रोचक पहलू है। हालांकि बलरामपुर ज़िले के इरशाद आलम ने अपना पक्ष रखा है वो सराहनीय कार्य है।

शब्बीर आलम ने नजमा ख़ातून का मर्डर किया
अंबिकापुर के बस व्यवसायी
बैदूल की दो बहनें हैं जिसमें एक का बेटा इरशाद आलम है जो यहाँ इन अपराधियों को लेकर आया सबसे पहले इरशाद अपने मौसा बाबू आलम को लेके आया।
अंबिकापुर में आने के बाद इरशाद के नाम पर और बैदूल के छोटे भाई बसीउर रहमान उर्फ़ छोटू के नाम पर बस लिए।
आज इरशाद आलम और इसके भाई नौशाद आलम इनके नाम पर कीमती बस है जिसकी क़ीमत करोड़ों में है।
आश्चर्य ये है कि इरशाद आज भी किराए के मकान में रह रहा है मुख्य आरोपी शब्बीर आलम के घर के बगल में।
बैदूल के घर की भी जांच हो जहाँ घर बना है उसकी भी जांच हो।

इरशाद एक परमिट पर यानि एक ही नंबर की तीन बस एक साथ संचालित किए है। ये अपने आप में संगीन मामला है।
बासेपुर मे 2001 में मर्डर हुआ था।
अंबिकापुर में बाबू आलम और शब्बीर आलम की कई कीमती ज़मीन शब्बीर आलम के बेटे कामरान साबरी के नाम से है।

झारखंड से आकर 13 वर्षों से खूंखार अपराधी अंबिकापुर में पूरे आराम से रहता है,कारोबार जमाता है और इसके आने के बाद से ही बैदुल का कारोबार भी तेज़ी से फैलता है। ऐसे में हर बात को संयोग कहकर टाल देना किसी बड़े खतरे का इशारा तो ज़रूर है।
फरार शब्बीर और इसके साथी कितने दिनों तक पुलिस से बचेंगे ये अब चूहा बिल्ली का खेल होगा या कुछ और?
वहीं सरगुजा पुलिस के दो अधिकारियों पर भी संदेह हो रहा है कि उनकी नज़र में ये मामला जांच का मुख्य बिंदु क्यों नहीं है?

इरशाद आलम के नाम ये कीमती बसें हैं, इनके लेन देन में यदि एक नंबर के रुपए हैं तो कोई बात नहीं मगर एक व्यक्ति के नाम इतनी बसें वो भी कम समय में कुछ संदेह उतपन्न कर रही हैं।

आमजन और कानून के कुछ दिग्गज जानकार खुलकर कह रहे हैं कि सरगुजा में अब ज़िले का पुलिस कप्तान कोई तेज तर्रार आईपीएस ही नियुक्त हो तभी जांच दिशा में होगी अन्यथा इतने गंभीर मुद्दे पर लीपा पोती भी संभावित है।

अब देखना ये है कि सरगुजा के आईजी दीपक झा जो कि लगातार अपने नेटवर्क से जांच पर नज़र बनाए हुए हैं वो किस तरह इसमें बिना किसी अवरोध के जांच को अंजाम तक पहुंचाते हैं साथ ही कोई नई टीम भी इस मामले में गठित करते हैं।

पहल लगातार लिख रहा है कि हम अपने तथ्य के आधार पर एक कड़ी को दूसरे कड़ी से जोड़ रहे हैं ओर जो भी तथ्य सामने आ रहे हैं उसको समाचार के माध्यम से आपके सामने ला रहे हैं।

इसमें कोई निर्दोष व्यक्ति किसी का शिकार न बने प्रशासन को इस विषय पर भी संवेदनशीलता के साथ सोचना पड़ेगा।

आलोक शुक्ल, सम्पादक पहल।

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